उत्तराखंड के देहरादून में ठेकेदार एवं प्रशासन की लापरवाही से मासूम की जान चली गई। मामला प्रेमनगर का है। यहां दशहरा ग्राउंड के चारों तरफ प्रशासन की तरफ से कई गड्ढे खोदे गए थे। इन्हीं में एक में पानी भरे गड्ढे में गिरकर एक पांच वर्ष के मासूम की दर्दनाक मौत हो गई थी। प्रेम नगर निवासी जितेंद्र सब्जी बेचने का काम करते थे उन्हीं का पांच वर्ष का बेटा अधीर घर से निकला तो वापस नहीं आया। काफी खोज बिन के बाद बच्चा गड्ढे में मृत पाया गया।
मामला प्रकाश में आने के बाद मानवाधिकार सी डब्लू ए के चेयरमैन योगेंद्र कुमार सिंह (योगी) ने प्रकरण की शिकायत आयोग में भेजकर मृतक के परिवार को उचित मुआवजा दिलाने एवं दोषियों के ऊपर कठोरतम कार्यवाही करने का अनुरोध किया था।
आयोग ने दिनांक 21/04/2025 की कार्रवाई के माध्यम से आयोग ने मामले का संज्ञान लिया और डीएम देहरादून एवं पुलिस अधीक्षक को संबंधित मामले में रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था।
आयोग के निर्देश के अनुपालन में अपर पुलिस अधीक्षक (HR)/ पुलिस मुख्यालय देहरादून ने दिनांक 31.05.2025 को की गई कार्यवाही की रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें बताया गया कि शिकायत के आधार पर थाना प्रेमनगर में एफआईआर संख्या 140/24, दिनांक 04.07.2024 के तहत धारा 105 BNS के अंतर्गत एक मामला दर्ज किया गया है। बच्चा निर्माण स्थल यानि दशहरा मैदान पर खोदे गए (बारिश के पानी से भरे) एक गड्ढे में डूब गया था। यह मामला एक निजी ठेकेदार द्वारा किया जा रहा था। रिपोर्ट में आगे यह भी बताया गया है कि दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से मामले को सुलझा लिया है, और इसी के तहत ठेकेदार ने पीड़ित परिवार को 4,00,000/- (चार लाख रुपए) दिए है। पीड़ित परिवार ने एक हलफनामा दिया है कि आगे की कार्रवाई न किया जाए।22.08.2025 को अंतिम रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत कर दी गई है।
आयोग ने मामले पर विचार किया और कहा कि हैरानी की बात है कि पुलिस ने इस मामले में इस आधार पर फाइनल रिपोर्ट, फाइल की थी कि दोनों पार्टियों ने अपनी मर्जी से मामला सुलझा लिया है और क्रांटेक्टर ने 4.00.000/- रुपए का मुआवजा दिया है। सिर्फ इस आधार पर फाइनल रिपोर्ट फाइल करना कि आरोपी ने शिकायत करने वाले के साथ मामला सुलझा लिया है, गलत हमदर्दी होगी। आयोग ने कहा कि कांट्रेक्टर की इतनी बड़ी लापरवाही को देखते हुए समझौता मानना और फाइनल रिपोर्ट फाइल करना समाज के हित में नहीं था। आरोप गंभीर है और एक मासूम लड़के की मौत को देखते हुए आरोपी की हरकते उसे समाज के लिए एक संभावित खतरा बनाती है। ऐसे अपराध निजी नहीं होते और समाज पर गंभीर असर डालते है। आयोग का मानना है कि फाइनल रिपोर्ट/क्लोजर रिपोर्ट फाइल करना तय कानूनी प्रक्रिया के खिलाफ है और IO द्वारा कानूनी प्रक्रिया का गलत स्तेमाल है।
आयोग ने मानवाधिकार के घोर उल्लंघन के मामले में उत्तराखंड के पुलिस महानिदेश से दो हफ्ते के भीतर जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था।
इसके बाद शिकायत और कार्यवाही रिपोर्ट के अध्ययन पर यह सामने आया कि ठेकेदार के साथ मुख्य नियोक्ता के रूप में राज्य प्रशासन की ओर से घोर लापरवाही हुई थी। इसके अनुसरण में यह दिखाने के लिए रिकॉर्ड पर कुछ भी नहीं लाया गया है कि जनता को निर्माण स्थल में प्रवेश करने से सावधान या रोका गया था। यदि ऐसी घटना को रोकने के लिए खोदा गया गड्ढा सुरक्षित नहीं किया गया होता। ठेकेदार और सरकार दोनों ने जनता के प्रति यह कर्तव्य निभाया।
आयोग का मानना है कि यदि ठेकेदार/ राज्य ने समय पर सुरक्षा सावधानियां बरती होती तो मासूम लड़के की मौत पूरी तरह से टाली जा सकती थी। निसंदेह राज्य के अधिकारी मौत के लिए जिम्मेदार है और परिणामस्वरूप मृतक पीड़ित के निकटतम सम्बन्धी को मुआवजा देने के लिए बाध्य है।
आयोग ने मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की धरा 18 के तहत चीफ सेक्रेटरी उत्तराखंड को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए कहा कि ठेकदार द्वारा दिए गए 4,00,000/- मुआवजे के अतिरिक्त सरकार 4,00,000/ मुआवजा क्यों न दे चार सप्ताह के भीतर उत्तराखंड सरकार जवाब दे। आयोग के निर्देश के बाद भी सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया।
उत्तराखंड सरकार की लापरवाह रवैया पर आयोग ने सख्ती दिखाते हुए रिमाइंडर जारी करते हुए कहा है कि विस्तृत रिपोर्ट चार सप्ताह के भीतर प्रस्तुत करे। ऐसा न करने पर आयोग मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की धारा 13 के तहत कठोरतम कार्यवाही करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। आयोग ने संपूर्ण रिपोर्ट 07/05/2026 तक प्रस्तुत करने का सख्त निर्देश दिया है।